पुराने ज़माने में व्यापारी या साधु-संत जगह-जगह घूमकर अलग-अलग घाटों से पानी पीते थे। इस प्रक्रिया में उन्हें विविध संस्कृतियों, लोगों और परिस्थितियों का गहरा व्यावहारिक ज्ञान मिलता था, इसीलिए यह मुहावरा परिपक्वता और अनुभव का प्रतीक बन गया।